Chhattisgarh Rajim Kumbh Mela Ke Bare Mein

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Chhattisgarh Rajim Kumbh Mela Ke Bare Mein: भारत में वैसे तो मुख्य रुप से चार कुंभ प्रसिद्ध है जो 6 साल में एक बार लगते हैं। इनमें सर्वप्रमुख इलाहाबाद का कुंभ, हरिद्वार का कुंभ, नासिक और उज्जैन का कुंभ प्रसिद्ध है जबकि फरवरी- मार्च माह में माघ पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक पन्द्रह दिनों के लिए लगने वाला भारत का पाँचवाँ कुम्भ मेला छत्तीसगढ़ की धार्मिक राजधानी प्रयागधरा राजिम में हर वर्ष लगने वाला कुम्भ है।

इसमें कई धार्मिक सम्प्रदायों के अखाड़ों के महंत, साधु-संत, महात्मा और धर्माचार्यों का संगम होता है। रजिम कुंभ हर साल छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के राजिम में आयोजित एक हिंदू तीर्थ यात्रा है। इस मेले के दौरान बड़ी संख्या में लोग और संत राजिम में इकट्ठे होते हैं।

राजिम माघी पुन्नी मेला Chhattisgarh Rajim Kumbh Mela Ke Bare Mein

Chhattisgarh Rajim Kumbh Mela Ke Bare Mein: प्राचीन काल से राजिम वैष्णवादी लोगों का एक तीर्थ केंद्र रहा है जो भगवान विष्णु के अनुयायी होते हैं। देश के हर नुक्कड़ और कोने से धार्मिक प्रचारकों और संतों की भीड़ इस मेले में लगती है। ये संत त्रिवेणी संगम के बीच रेतीले क्षेत्र में बने विशेष तंबूओं में रहते हैं।

अब वर्ष 2019 से छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की शासन आते ही, सरकार ने पुनः राजिम पुन्नी मेला महोत्सव मनाने का निर्णय लिया है। कुछ वर्ष पहले यह एक मेले का स्वरुप था यहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक पंद्रह दिनों का मेला लगता है राजिम तीन नदियों का संगम है इसलिए इसे त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है।

यह मुख्य रूप से तीन नदिया बहती है, जिनके नाम क्रमश महानदी, पैरी नदी तथा सोढुर नदी है, राजिम तीन नदियों का संगम स्थल है, संगम स्थल पर कुलेश्वर महादेव जी विराजमान है, वर्ष २००१ से राजिम मेले को राजीव लोचन महोत्सव के रूप में मनाया जाता था, २००५ से इसे कुम्भ के रूप में मनाया जाता रहा था, और अब 2019 से राजिम पुन्नी मेला महोत्सव मनाया जाएगा। Chhattisgarh Rajim Kumbh Mela Ke Bare Mein

राजिम कुंभ मेला उत्सव

Chhattisgarh Rajim Kumbh Mela Ke Bare Mein: मेला की शुरुआत कल्पवाश से होती है पखवाड़े भर पहले से श्रद्धालु पंचकोशी यात्रा प्रारंभ कर देते है पंचकोशी यात्रा में श्रद्धालु पटेश्वर, फिंगेश्वर, ब्रम्हनेश्वर, कोपेश्वर तथा चम्पेश्वर नाथ के पैदल भ्रमण कर दर्शन करते है तथा धुनी रमाते है, १०१ कि॰मी॰ की यात्रा का समापन होता है और माघ पूर्णिमा से कुम्भ का आगाज होता है, राजिम कुम्भ में विभिन्न जगहों से हजारो साधु संतो का आगमन होता है, प्रतिवर्ष हजारो के संख्या में नागा साधू, संत आदि आते है, तथा शाही स्नान तथा संत समागम में भाग लेते है।

प्रतिवर्ष होने वाले इस महाकुम्भ में विभिन्न राज्यों से लाखो की संख्या में लोग आते है,और भगवान श्री राजीव लोचन, तथा श्री कुलेश्वर नाथ महादेव जी के दर्शन करते है, और अपना जीवन धन्य मानते है, लोगो में मान्यता है की भनवान जगन्नाथपुरी जी की यात्रा तब तक पूरी नही मानी जाती जब तक भगवान श्री राजीव लोचन तथा श्री कुलेश्वर नाथ के दर्शन नहीं कर लिए जाते, राजिम कुम्भ का अंचल में अपना एक विशेष महत्व है। 

यहां श्रद्धालुगण दूर-दूर से आकर इनके प्रवचनों का लाभ लेते हैं। इसमें शाही कुम्भ स्नान होता है जो देखने लायक रहता है। नागा साधुओं के दर्शन के वास्ते भीड़ उमड़ पड़ती है। अखाड़ों के साधुओं के करतब लोगों को आश्चर्य में डाल देते हैं। राजिम कुम्भ मेले के लिए राजिम और नवापारा के सभी मंदिरों में आकर्षक रोशनी लगाई जाती है जिससे उनकी सुंदरता और बढ़ जाती है।

राजिम मेले की एक विशेषता यह भी है कि यह  महानदी के किनारे और उसके सूखे हुए रेतीले भाग पर लगता है। जगह जगह पानी भरे गड्डे और नदी की पतली धाराएं मेले का अंग होती हैं। इन्ही धाराओं पर बने अस्थाई पुल से हजारों लोग राजीव लोचन मंदिर से कुलेश्वर महादेव मंदिर को आते -जाते हैं। तरह -तरह के सामानों  की दुकानें , सरकारी विभागों की प्रदर्शनियां एवं खेल -तमाशों के बीच एक ओर सत्संग तो दूसरी ओर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते रहते हैं।  

राजिम पुन्नी मेले का आयोजन छत्तीसगढ़ शासन एवं स्थानीय आयोजन समिति के सहयोग से होता है। Chhattisgarh Rajim Kumbh Mela Ke Bare Mein

राजिम कुंभ मेला से जुड़ी कथा

Chhattisgarh Rajim Kumbh Mela Ke Bare Mein: राजिम कुंभ को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलित है कथा के अनुसार पृथ्वी को मृत्युलोक में स्थापित करके विघ्नों को नाश करने के लिए ब्रह्मा सहित देवतागण विचार करने लगे कि इस लोक में दुष्टों की शांति के लिए क्या करना चाहिए? इतने में अविनाशी परमात्मा का ध्यान किया तो एकत्रित देवता बड़े आश्चर्य से देखते हैं कि सूर्य के समान तेज वाला एक कमल गो लोक से गिरा, जो पाँच कोस लम्बा और सुगंध से भरा या जिसमें भौंरे गुँजार कर रहे थे तथा फूल का रस टपक रहा था मानो यह कमल नहीं अमृत का कलश है। 

ऐसे कमल फूल को देखकर बह्मा जी बहुत प्रसन्न हुए और आज्ञा दी कि हे पुष्कर ‘तुम मृत्युलोक में जाओ’ जहाँ तुम गिरोगे वह क्षेत्र पवित्र हो जाएगा, नाल सहित वह मनोहारी कमल पृथ्वी पर गिरा और पाँच कोस भूमंडल को व्याप्त कर लिया।

जिनके स्वामी स्वयं भगवान राजीवलोचन हैं। कमल फूल की पाँच पंखुड़ी के ऊपर पाँच स्वयं भूपीठ विराजित हैं जिसे पंचकोशी धाम के नाम से जाना जाता हैं। श्री राजीवलोचन भगवान पर कमल पुष्प चढ़ाने का अनुष्ठान है। इन्हीं दिनों से यह पवित्र धरा कमलक्षेत्र के रूप में अंकित हो गया। परकोटे पर लेख के आधार पर कमलक्षेत्र पद्मावती पुरी राजिम नगरी की संरचना जिस प्रकार समुद्र के भीतर त्रिशूल की नोक पर काशी पुरी तथा शंख में द्वारिकापुरी की रचना हुई है, उसी के अनुरूप पाँच कोस का लम्बा चौड़ा वर्गाकार सरोवर है। बीच में कमल का फूल है, फूल के मध्य पोखर में राजिम नगरी है।

छत्तीसगढ़ कुंभ मेला के बारे में प्रश्न जो लोगों द्वारा पूछे जाते हैं Chhattisgarh Rajim Kumbh Mela Ke Bare Mein

राजिम मेला कब है 2023?

यह वार्षिक उत्सव माघ पूर्णिमा से पंचांग के अनुसार, हिंदू कैलेंडर के अनुसार शिवरात्रि तक आयोजित किया जाता है। 

राजिम क्यों प्रसिद्ध है?

Chhattisgarh Rajim Kumbh Mela Ke Bare Mein: चित्रिमपाला, पैरी और सोंदूर नामक तीन नदियों के संगम के कारण राजिम को ‘छत्तीसगढ़ का प्रयाग’ भी कहा जाता है। इसलिए, यह भक्तों के लिए एक पवित्र नदी है और हिंदू कैलेंडर के अनुसार शुभ दिनों पर पवित्र डुबकी लगाना शुभ माना जाना जाता है। हिंदू धर्म का एक अभिन्न अंग होने के नाते, यह क्षेत्र विष्णु मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।

कुंभ मेला कौन से राज्य में है?

हरिद्वार में गंगा नदी में, उज्जैन में शिप्रा नदी में, नासिक में गोदावरी और प्रयाग (इलाहाबाद) में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम स्थल पर कुंभ का आयोजन होता है। जबकि छत्तीसगढ़ में तीन नदियों महानदी, पैरी नदी तथा सोढुर नदी के संगम स्थल पर यह कुंभ मेला होता है।

राजिम में कौन सी नदी है?

राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग मानते हैं, यहाँ पैरी नदी, सोंढुर नदी और महानदी का संगम है। 

राजिम का पुराना नाम क्या था?

इस स्थान का प्राचीन नाम कमलक्षेत्र है। ऐसी मान्यता है कि सृष्टि के आरम्भ में भगवान विष्णु के नाभि से निकला कमल यहीं पर स्थित था और ब्रह्मा जी ने यहीं से सृष्टि की रचना की थी। इसीलिये इसका नाम कमलक्षेत्र पड़ा।

कुंभ मेले का क्या महत्व है?

यह लगभग 12 वर्षों के चक्र में मनाया जाता है, हर क्रांति को मनाने के लिए बृहस्पति (बृहस्पति) चार नदी-किनारे तीर्थ स्थलों पर: इलाहाबाद (गंगा-यमुना-सरस्वती नदियों का संगम), हरिद्वार (गंगा), नासिक (गोदावरी), और उज्जैन (शिप्रा)।

कुम्भ का मतलब क्या होता है?

कुम्भ का शाब्दिक अर्थ कलश होता है. कुम्भ का पर्याय पवित्र कलश से होता है। इस कलश का हिन्दू सभ्यता में विशेष महत्व है।

कुंभ चक्र क्या है?

कुंभ का रहस्यमय पहलू यह है कि मानव शरीर में छह शक्ति चक्र होते हैं और शरीर छठा इकाई है जो जुनून, क्रोध, जुनूनी लगाव, अहंकार और आलस्य से बना है। कुंभ के शरीर में छह चक्रों के माध्यम से विकसित होने के बाद इन दुश्मनों को हराया जा सकता है।

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